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		<title>भैया जी बोले</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Oct 2025 15:57:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Bhaiya Ji Bole]]></category>
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					<description><![CDATA[भैया जी बोले भैया जी बोले &#8211; सत्ता देखी, पॉवर देखा,और पॉवर का टावर देखा गली गली का पानी देखा और पानी में फायर देखा राह में चुभते काँटे देखे काँटों में एक फ्लावर देखा भैया जी जब कहें कहानी सेकंड, मिनट ना ऑवर देखा सत्ता देखी, पॉवर देखा राजनीति का टावर देखा]]></description>
		
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		<title>किसको गांधी चाहिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Oct 2025 15:52:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Poetry]]></category>
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					<description><![CDATA[तहल्का तहल्का के पत्रकारों ने किया बड़ा पर्दाफ़ाश है हर तरफ मखौल है, हर तरफ परिहासस है एक वर्ग की चिंता है की नेता खाता क्यों है तो दूसरे की की खाता है तो पकड़ा जाता क्यों है एक वर्ग का मानना है की ये सरकार हर फ्रन्ट पर फेल  है आखिर सफाई से खाना भी कोई हंसी खेल है अर्थक्षक्षत्री दुखी हैं की भारत फिर से गरीबी रेखा के नीचे जा रहा है सताधारी सम्मानित पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष सिर्फ 1 लाख खा रहा है अर्रे डॉलर वाले देशों में तो इतना चपरासी पा ता है ये अलग बात है की वो इसके लिए अपना  पसीना बहाता है समाजशास्त्री खिन्न है की आजादी के तमाम सालों  के बाद भी  दलित का उत्पीड़न हो रहा है लाख रुपए के लिए एक सम्मानित दलित अपनी अस्मितया खो रहा है इतिहासकारों को भी इस घटना की गंभीरता का एहसास है क्योंकि घूस लेने देने में भारत का एक गौरवशाली इतिहास है देखिए तो 50 सालों में कितना परिपक्व हुआ है हमारा लोकतंत्र अब घूस लेना सेवा है और उसे पकड़वाना एक षड्यन्त्र तहलका]]></description>
		
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		<title>Kashi mai bawal hai !!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 13:37:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Satire]]></category>
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					<description><![CDATA[Kashi mai bawal hai !! बरसों बाद कल मेरा पुनः काशी आना हुआ। अद्भुत शहर है ये और अद्भुत हैं काशी के वासी। उतना ही ठहरा हुआ है जितना बदल रहा है काशी। बाज़ार बड़े हो गए हैं और सड़कें  छोटी। रांड, सांड, सिढ़िऊ, संन्यासी के शहर  में मेट्रो, ट्राम और फ्लाइओवर्स बनाना तो मुश्किल था तो देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े जादूगर ने यहाँ रोप ट्रिक का इस्तेमाल किया और काशी को दे दी रोपवे। जिसका निर्माण चल रहा है जिसके चलते काशी तमाम लोगों के घर दुकाने और दफ्तर तोड़ दिए गए। काशी की पहचान समझे जाने वाले मशहूर चाट काशी की चाट बंद मिली खैर ऐसी छोटी मोटी कुर्बानिया तो देनी ही पड़ती हैं विकास जो २०१४ में जन्मा था के किशोर अवस्था में प्रवेश पाने के लिए।।  व्यस्त बाज़ार में नज़र टिकी एक बड़ी दुकान के चमकदार साइन बोर्ड पे। ‘बवाल’ बड़े बड़े अक्षरों में अंकित । ये किसी ओटीटी  सीरीज का शीर्षकि होने के लिए उपयुक्त नाम पर दुकान का नाम बवाल। बवाल का शाब्दिक अर्थ है बखेड़ा, झंझट, या विवाद खड़ा करना इत्यादि जिसका दूर दूर तक कपड़ों की ख़रीद फ़रोश्त से कोई लेना देना है। ब्रांडिंग भी अद्भुत विधा है अपने पे आ जाए तो ज़हर को अमृत से ज़्यादा लोक प्रिय बना दे। खैर मैं दोबारा तब चौका जब होटल के बाहर ये सूचना का पोस्टर देखा जिस पर लिखा हुआ था होटल में हथियार ले जाना मना है। सोचा, होटल में हथियार कौन ले कर जाता है, पर बनारस में ये सूचना देना लाजिमी है जहाँ बवाल फैशन में हो वहाँ  असलहा (कट्टा इत्यादि) वग़हरा तो फैशन एक्सेशरी में होंगे ही। उन्हें  लेकर चलना काशी की सामाजिक व्यवस्था में आपको अग्रिम श्रेणी में खड़ा करता है। चलिए ऐसे नाम, पोस्टर और दीवार पर लिखे विभिन नारे तो ध्यान आकर्षित करते हैं हीं , पर उससे भी जायदा सोचने को मजबूर करती है बाबा विश्वनाथ के मंदिर की यात्रा। सुबह ३।३० बजे पौ फटने के पहले लोग लाइन लगा लेते हैं मगला आरती को, प्रभु के जागने का समय है वो। सुबह की इस आरती के साथ ही बनारस के देव महादेव का जागरण होता है और उन्हें स्नान कराया जाता है। ४ बजे से लोग लाइन में जमा हो जातें हैं वीआईपी के नाम पर आपको एक व्यक्ति मिल जाता है जो बाबा के प्रताप की विस्तृत चर्चा करता हैं। लोग लाइन लगातें है और भक्त ऊन्हे भगवान की महिमा के किस्से सुनातें हैं हर हर महादेव के उद्घोष से वातावरण कौंध उठता है भगवान को भक्त और भक्तों को दक्षिणना  मिल जाती है। और ये सब देती हैं जनता। आपको ये अपनी लोकतासांत्रिक व्यवथा जैसा नहीं लगता है, जहाँ लीडर भगवान, राजनैतिक कार्यकर्ता भक्त और जनता वो सब्जेक्ट जो इस व्यवथा को अपने खर्चे से चलाती  है और कुछ नहीं पाती  है। जो कुछ मिल जाता है उसे प्रभ्गु की दया से मिला प्रसाद समझ कर शिरोधारय कर लेती है और पुनः किसी और देव  के सामने लाइन लगा लेती  है। १४० + करोड़  देशवासियों के लिए ३३ कारोंड देवी देवता। ये है भगवानी करण का राजनैतिक करण, या यूँ कहें कि राजनीति का भगवानी करण। ]]></description>
		
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		<title>Bigg Boss Chahte hai</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 13:34:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Satire]]></category>
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					<description><![CDATA[Bigg Boss Chahte hai&#8230;. बिग बॉस एक अद्भुत प्रयोग है. इसकी खोज तमाम अन्य ज़रूरी और ग़ैर ज़रूरी खोजो की तरह विदेश में तब हुई जब ‘बिग ब्रदर’ के नाम से सन 1997 में, प्रोडूसर  जॉन दे मॉल ज्यूयर ने डच में इसी शीर्षक का  एक शो लांच किया जिसमे उन्होंने एक विशेषत: बनाये घर में कुछ ‘ग्रह अतिथि’ प्रतियोगियों को तम्मम कैमरों की निगरानी में छोड़ दिया।  मनोविज्ञान की माने तो हर एक इंसान में एक ना एक पशु प्रविर्ति (animal instinct) छिपी  होती है जो अति अनकूल या अति प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने को ज़ाहिर करती हैं। और अति अनकूल या प्रतिकूल परिस्थित्यों का निर्माण करना ही इस रियलिटी शो के विचार का जनक होगा। सन 2000 में ये शो अमरीका पहुँचा और वहाँ पर भी दर्शकों ने इसको खूब सराहा तब शुरू हुआ इसका ग्लोबिलीकरण। अमरीकी सांस्कृतिक निर्यात के चलते  स्पेन से होता हुआ ये शो भारत में 2006 में पहुँचा। और चाऊमीन को देसी बनाने वाली मानसिकता/कला ने इसको बिग बॉस के स्वरूप में प्रस्तुत किया।   पर यहाँ इस अतिथि ग्रह को मनोव्याज्ञिक प्रयोग शाला की बजाय एक चिड़ियाघर का स्वरूप ज़्यादा बना दिया गया है  जहाँ अपनी पशु प्रविर्ति तलाश करते कुछ प्रतियोगी और उनको विभिन्न दिशाओं में हाँकने के लिए एक रिंग मास्टर सलमान ख़ान। जो पहले कुछ एपिसोड्स में कुछ करो कुछ करो कह कर प्रतियोग को कुछ करने के लिए उत्साहित/मजबूर करते हैं और उसके बाद के एपिसोड्स में ये क्या कर रहे हो ये कैसे कर रहे हो की रट लगा कर सार्वजनिक रूप से अपमानित।  शो उतना ही रीयल है जितना की सलमान ख़ान की फ़िल्में होती हैं। और स्क्रिप्ट उतनी ही विसंगत। लोगों की जन्म प्रक्रिया से लेकर उनकी औक़ात के मूल्यांकन तक सभी प्रकार की टिप्पड़ियों मुखर रूप से की जाती हैं।  और अपने जीवन की वास्तिकताओं से जूझ रहे दर्शक को दूसरे के जीवन की कड़ुवाहट का आनंद लेना अत्यंत सुखद अनुभव लगता है वो रोज़ जिन पशु प्रवित्रिओं को दबाने के लिए संघर्ष करता है उनको मुखर रूप से प्रदर्शित करने वाले प्रतिएगियों से उसे लगाव हो जाता है।  तो मनोविज्ञान की प्रयोगशाला हो या एक खूबसूरत सा चिड़ियाघर, मनोरंजन के लिए सब कुछ जायज़ है।बिग बॉस की साख भले ही धुंधली हो गई हो, आँख अभी भी तेज है।]]></description>
		
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		<title>GenZ (Yuva)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 13:26:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Satire]]></category>
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					<description><![CDATA[GenZ (Yuva) युवा को क्या हुआ  व्यंग लोकप्रिय विचार की धारा के विपरीत भी जाने का दुस्साहस करता है तो आज जो विषय मैंने लिखने के लिए चुना है वो प्रचलित भावना के विरुद्ध है नेपाल में जो हो रहा है, बांग्लादेश में जो हो चुका है और श्री लंका ने जिसकी झलक देखी है वो एक लिहाज़ से तो अच्छा है पर कई मानकों पर गर्व करने की बात बिल्कुल नहीं है। मैं पहले ही एक डिस्क्लेमर लगा दूँ। मैं व्यक्तिगत रूप से इस २० ईयर ओल्ड सिंड्रोम से त्रस्त हूँ अत: मेरे लिखे को थोड़े नमक के साथ चखियेगा।  मीडिया में अक्सर सवाल उठाया जाता है – how will २० year old react to it। हर चीज़ मानो उनके स्वादानुसार ही रचनी है। जैसे उनके विचार विचार हैं बाक़ी सबके आंचार। और अब देखिए कैसा उत्पात मचा रखा है इस बीस सालिया भीड़ ने, नेपाल में।  बेईमान सरकार को हटाने वाले दुकान लूटते और पब्लिक प्रॉपर्टी को आग लगते पाए गए। मैं सत्तारूढ़ ८० सालियों का समर्थक नहीं हूँ वरन् उनको हटाने के पक्ष में हूँ पर एक व्यावहारिक विकल्प बनने के पश्चात और उस विकल्प की शक्ल क्या होगी इसको विचार करने की जिम्मेदारी भी २० सालिया गैंग को लेनी होगी।  व्यवस्था को व्यवस्था से बदला जा सकता है, अराजकता से नहीं। ये बीस सालिये जिम्मेदारी उठाने से हमेशा बचते पाए जाएँगे।  अब शादी को ही ले लीजिए ये बीस सालिये तीस सालिये होने से पहले शादी करने के नाम से ही भागते हैं अरे मर्द के सॉरी मर्द और औरत के बच्चे हैं तो हम्मारी तरह शादी के ३० साल की वर्षगाँठ कहाँ माननी है के दबाव को महसूस कर के दिखाएँ पर नहीं वो तो लिव इन लिव आउट विथ बेनेफिट्स आदि तमाम नए फार्मूले ट्राय कर रहे हैं। इन्हें क्या पता की शादी एक ऐसा बोझ है जिसे burden of the cross की तरह ढोने में ही मोक्ष है। इससे दुनियाबी चीजों से इंसान को विरक्ति हो जाती है अत वो भगवत भजन में रस तलाश कर लेता है। जीवन की इस महत्वपूर्ण व्यवस्था को एक्सपीरियंस किए बिना एक जिम्मेदार नागरिक बनना मुश्किल है। मैं आपको बता दूँ ये animal फ़िल्म के हिट होए के पीछे भी इस बीस सालियों का हाथ है। और तम्माम अतरंगी गानों के पीछे भी। ये बीस सालिये हर तरफ़ टिड्डी दल की तरह फ़ैल चुके हैं। इनके प्रकोप से बचने के उपाय चीर्ण होते जा रहें हैं।  बिना जिम्मेदारियों की समझ होने पर अधिकारों की माँग न्याय संगत नहीं है।इस जनरेशन के लिए तो और भी नहीं क्योंकि हम्मड़ी जनरेशन जब २० साल के दशक में आई थी तो हम्मे कहा जा रहा था कि अभिवाहकों की सुनो सो हम सुनते रहे जब हमने नेक्स्ट जनरेशन को २० साल का बना दिया तो रूल चेंज हो गया और हनमे कहा गया की बच्चों की मानो।  मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि अगर इन बीस सालियों को जिम्मेदारी उठाए बिना अधिकार देने की आदत डाल दी तो सामाजिक और राजनैतिक अराजकता के लिए तयार रहना चाहिए।  ]]></description>
		
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		<title>Gaya Gurugram Pani Mai</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 13:24:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Satire]]></category>
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					<description><![CDATA[Gaya Gurugram Pani Mai लोकमान्यता अनुसार महाभारत काल में इन्द्रप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली )के राजा युधिष्ठिर ने यह ग्राम अपने गुरु द्रोणाचार्य को दिया था। उनके नाम पर ही इसे गुरुग्राम कहा जाने लगा, जो कालांतर में बदलकर गुड़गांव हो गया। महान गुरु भक्त एकलव्य का गुड़गांव से गहरा संबंध है। इस स्थान पर ही गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अंगूठा मांगा था। गुरुग्राम एक कृषि प्रधान गाँव होता था। जो आर्थिक विकास की धारा में कार मैन्युफ़ैक्चरिंग से शैल हुआ और फिर 90 के दशक में IT क्रांति के बाद ये मिलेनियम सिटी की तरह ब्रांड किया गया और neo rich का फेवरेट डेस्टिनेशन हो गया। फिर क्या था गुड़गांव के दिन बहुरे और सम्पत्ति के दाम दिन दूनी और रात चौगनी रफ़्तार से बढ़ने लगे, और बढ़ते जा रहे हैं। मगर पिछले दिनों आई बरसात ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है की कहीं ये प्रचार भ्रमित करनेवाला तो नहीं था। और होना भी चाहिए कहते हैं जितनी चादर हो उतने पाव फैलाओ पर यहाँ तो जरा सी बरसात हुई और घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही सड़क पे बना है तलाव। घंटों के जाम,  ऐसे में लोगों का जेब काट गई सोचना कोई अनहोनी नहीं असल में यहाँ के लोग भ्रामक प्रचार के प्रकोप को जानते हैं। आख़िर कार गुरुदेव द्रोणाचार्य ने तो अपनी जान भ्रामक प्रचार के चलते गँवाई।युधिस्तर के काल में अश्वस्थामा हतो हता सुनते शास्त्र रख दिए। नरों कुंज़रो तक आते आते शंख बज गया और भ्रामक प्रचार की वजह से उनका सर काटा और अब लोगों की जेब काट रही है। गुरुग्राम के फ्लैटों के अंदर की बाहर सबने देखी और बाहर की बाढ़ या यूँ कहें जनरल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी किसी ने नहीं देखी। अब तो हालात ये हैं कि लोग सोच रहे हैं कि स्लम से उठ कर आये मिलियनेयर्स पर तो फ़िल्म बन चुकी स्लम में उठ कर जाने वालों पर फ़िल्म कब बनेगी]]></description>
		
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		<title>आवारा हूँ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 11:11:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Satire]]></category>
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					<description><![CDATA[आवारा हूँ ना जाने क्यों आज आज़ादी के ७९ सालों के महत्पूर्ण अवसर पर  मैं उन आवारा कुत्तों सा महसूस कर रहा हूँ जो सर्वोच्य न्यायालय के आदेश का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। हालांकि मेरे अंदर अवरर्गी जैसी कोई बात नहीं है यूँ तो कुत्ता गुणों का भी अभाव है। जैसे की मैं मैं वफादार नहीं हूँ ये नहीं की मैं होना नहीं चाहता हूँ पर क्योंकि तम्माम भारतीयों की तरह मुझे भी ये ज्ञान नहीं है की किसका वफ़ादार  होना है। कारण  की मैं देश के मिडल क्लास की तरह ना ही सरकार की चलाई जा रही स्कीमैं  मुझे पाल रही हैं ना सरकार के दिए लाइसेंस, परमिट ठेके और  ना ही भारतीय बैंकों से भारी निवेश करा कर मुझे फ़रार होने का अवसर प्राप्त हुआ है।  यूँ तो दुम हिलाने के लिए मैं मानसिक रूप से तयार हूँ पर  मुझे रश्क होता है उन कुत्तों  से जिनके सर पर अदानी अंबानी का वरद हस्त है, गले मैं पड़ा सुंदर  पट्टा भी ईर्ष्या का विषय है हालांकि संतोष उस पट्टे से बँधी चैन को देख कर जरूर होता है।  मुझे उन गोदी कुत्तों (lap dogs) को देख कर भी बड़ा दर्द होता है जो गोदी बनकर गोदी का कम्फर्ट उठा रहें हैं और सरकार द्वारा दिए गए बिस्किट चबा रहें हैं  जिन्हें कभी कदार मुख चाटने का अवसर भी  मिलता है हालाँकि संतोष उनकी तलवे चाटने की मजबूरी पर जरूर होता है।  मनुष्य की कुत्तों के प्रति नीयत साफ़ नहीं है उसने अपने भौकने के लिए तो तमाम प्लार्टफ़ॉर्म (सोशल मीडिया) बना लिए हैं जिन पर वो जम कर भौकते है पर हमारे भोकने पर प्रतिबंध लगाना चाहता है। और उसे कारण बना कर हमें शेल्टर भिजवाना  चाहता है।    हमरे काटने का भी बढ़ चढ़ कर भ्रामक प्रचार हो रहा है जबकि मनुष्य बेधड़क हो कर सब  को काट रहा है। संस्थाएं भी इस काटन प्रक्रिया में शामिल हैं अब इलेक्शन कमीशन को ही ले लीजिए एक झटके में लाखों लोगों का वोट देने का अधिकार काट लिया, विपक्ष खाली हमारी तरह भौक रहा है। परिस्थिति ऐसी है की सरकार किसी गाड़ी की तरह बेझिझक भाग रही है और विपक्ष उसके पीछे बस भॉ भौं करता दौड़ रहा है।।  मैं उन सेलिब्रिशन से भी कहना चाहता हूँ जो हमारे पक्ष में आवाज़ उठा रहें है की सिर्फ़ सोशल मीडिया पर भौकने से हमारी समस्या का हल नहीं होगा, डॉग शेल्टर बनाने के लिए चंदा दे कर अपने कुत्ता प्रेम का प्रदर्शन करें। वरना हम हर सड़क हर गली में स्वर्गीय राज कप्पुर जी का गाना भौकांयेगे की गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ आवारा हूँ]]></description>
		
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		<title>अनुलोम-विलोम का प्रवेश</title>
		<link>https://bolbefikr.com/anulom-vilom/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 11:10:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Satire]]></category>
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					<description><![CDATA[अनुलोम-विलोम का प्रवेश कभी-कभी जीवन में ऐसे मोड़ आ जाते हैं जिनकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। मैं पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि मैं कभी भी भौतिक संस्कृति का झंडाबरदार नहीं रहा हूँ। हमारे समय में ‘मॉर्निंग वॉक’ व्यायाम का एकमात्र पर्याय मानी जाती थी — और वह भी प्रायः रिटायरमेंट के बाद ही शुरू होती थी। कभी-कभी माताएँ दुबले या मोटे होने पर अपनी राय देती थीं — बहू मोटी हो रही है, दामाद बहुत दुबला है — इस पर घर की महिलाओं में चिंता व्यक्त करना आम बात थी। हाँ, जब सर के बाल झड़ने लगते तो लोग तरह-तरह के नुस्ख़े भी बताते — “फलाँ तेल लगाओ”, “मालिश करो” वगैरह। पर जब से योगा का व्यवसायीकरण हुआ, लोग बालों की रक्षा के लिए नाखून रगड़ते नज़र आने लगे। इतना आसान उपाय तो किसी थेरेपी में भी नहीं होता। और फिर आ गया सोशल मीडिया। जब सूचना क्रांति आई और हर हाथ में Instagram आ गया, तब ‘आकाशवाणी’ (रेडियो वाली नहीं — सीधे आकाश से उतरने वाली वाणियाँ) पर विश्वास करने वाले ‘रील’ के भी भक्त बन गए। विश्वगुरु बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले इस देश में अचानक एक पूरा जत्था पैदा हो गया जो OHCD (Obsessive Health Consciousness Disorder) से ग्रस्त था। इन नए-नए ‘इन्फ़्लुएंसर्स’ ने स्वास्थ्य के ऐसे चमत्कारिक नुस्ख़े पेश किए कि नींबू पानी ‘जीवनामृत’ बन गया और उल्टा लटकना दीर्घायु का शॉर्टकट। शीर्षासन छोड़िए, मुझे तो शवासन को छोड़कर कोई भी आसन तर्कसंगत नहीं लगता। अच्छे-भले मनुष्य योनि में जन्मे लोग जब ‘कैट-काऊ’ बनकर जानवरों जैसी मुद्राएँ करने लगते हैं तो चिंता होना स्वाभाविक है। कपालभाति की धौंकनी जैसी ध्वनि मुझे विचलित करती है। मॉर्निंग वॉक के दौरान अट्टहास करते लोगों को देखकर मुझे हीनता का अनुभव होता है — लगता है कोई बात तो ऐसी है जो मुझे समझ में नहीं आ रही और यही उनकी हँसी का कारण है। पर नहीं — अकारण हँसना ही एक व्यायाम बन गया है। काश, इनकी ज़िन्दगियों में थोड़ा-सा ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ होता तो इन्हें यूँ ज़ोर लगाकर हँसना न पड़ता। हालाँकि ताली बजाने वालों से भी मेरा ‘हरि ओम’ हो चुका है — पर सार्वजनिक स्थान पर इस प्रकार की हरकतें! व्यायाम के और भी आयाम हैं, जैसे जिम जाना। वहाँ मशीन पर बिना वजह भागता इंसान मुझे विचित्र लगता है। जी करता है मशीन का पॉवर ऑफ करके पूंछे भैया कौन पीछे पड़ा है। खड़ी हुई साइकिल पर तीव्र गति से पैडल मारते व्यक्ति को रोककर कहने का मन करता है — “भाई, ये चल ही नहीं रही खड़ी है, कहे पैडल भांजे ho?” व्यंग्यकार की मुश्किल यही होती है कि जो बात समझ में नहीं आती उस पर हँसी आती है, और जिस पर हँसी आती है, वह बात समझ में नहीं आती। पर समाज ने इसे अपना लिया है। चारों ओर के सामाजिक दबाव से अपने प्राण बचाने के लिए मैंने भी उम्र के 62वें वर्ष में ‘प्राणायाम’ को अपने जीवन में प्रवेश दे दिया है। अब आप लोग भी साँस को धीरे-धीरे छोड़िए — हमारा व्यंग्य-व्यायाम यहीं समाप्त होता है। हरि ओम — अनुलोम-विलोम।]]></description>
		
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		<title>तहल्का</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 11:10:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Poetry]]></category>
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					<description><![CDATA[तहल्का तहल्का के पत्रकारों ने किया बड़ा पर्दाफ़ाश है हर तरफ मखौल है, हर तरफ परिहासस है एक वर्ग की चिंता है की नेता खाता क्यों है तो दूसरे की की खाता है तो पकड़ा जाता क्यों है एक वर्ग का मानना है की ये सरकार हर फ्रन्ट पर फेल  है आखिर सफाई से खाना भी कोई हंसी खेल है अर्थक्षक्षत्री दुखी हैं की भारत फिर से गरीबी रेखा के नीचे जा रहा है सताधारी सम्मानित पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष सिर्फ 1 लाख खा रहा है अर्रे डॉलर वाले देशों में तो इतना चपरासी पा ता है ये अलग बात है की वो इसके लिए अपना  पसीना बहाता है समाजशास्त्री खिन्न है की आजादी के तमाम सालों  के बाद भी  दलित का उत्पीड़न हो रहा है लाख रुपए के लिए एक सम्मानित दलित अपनी अस्मितया खो रहा है इतिहासकारों को भी इस घटना की गंभीरता का एहसास है क्योंकि घूस लेने देने में भारत का एक गौरवशाली इतिहास है देखिए तो 50 सालों में कितना परिपक्व हुआ है हमारा लोकतंत्र अब घूस लेना सेवा है और उसे पकड़वाना एक षड्यन्त्र तहलका]]></description>
		
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		<title>मझधार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 11:10:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मेहनत का फल मत दो ऐसे संस्कार, भ्रामक है ये शिक्षा की कर्म किए जा फल की रखना ना  कोई इक्छा कर्म किया, फल का मिलना तो स्वाभाविक है हक मांगा है , माँगी है ना कोई भिक्षा मेहनत का फल सही मिला होता तो होता कैसा मेहनतकश के हाथों में होता पैसा साहूकार और ज़मींदार भी मेहनत करते सब मेहनतकश एक कुँवे से पानी भरते पर यहाँ बहा रक्खी है तुमने उल्टी गंगा मेहनतकश ही घूम रहा है भूँखा नंगा चंद चुनिंदा चंपू हैं रेवड़िया खाते जिसको अपने अपनों को कुछ अंधे बाटे सुनो तात अब ये निर्णय भी लेना होगा मेहनत कश को मेहनत का फल देना होगा]]></description>
		
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